Ad

Category: Glamour

भाजपा सांसद स्मृति ईरानी ने कांग्रेस सांसद संजय निरुपम के विरुद्ध मान हानि का केस दर्ज़ कराया:कोर्ट ने संज्ञान में लिया

दिल्ली|छोटे परदे की बड़ी स्टार और अब भाजपा की सांसद स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के बडबोले सांसद संजय निरूपम के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया है| अब सुनवाई ७ फरवरी को होगी| उन्होंने निरूपम पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया है। इसपर संज्ञान लेते हुए अदालत ने स्मृति के बयान दर्ज कर लिए।पटियाला हाउस स्थित मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जय थरेजा ने साक्ष्यों के आधार पर धारा 499 के तहत मानहानि व 503 के तहत आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने का ठोस आधार पाया | अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद ही संजय निरूपम को समन जारी करने के मुद्दे पर विचार किया जाएगा। ।भाजपा सांसद स्मृति अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं और कांग्रेस सांसद के खिलाफ लगाए आरोपों पर करीब 45 मिनट तक अपने बयान दर्ज कराये | इस दौरान अदालत ने सभी लोगों को अदालत से बाहर जाने का आदेश जारी कर दिया।
गुजरात चुनावों के परिणामों पर २० दिसंबर को चल रही ऐ बी न्यूज चेनल पर हो रही एक बहस के दौरान उत्तेजित काँग्रेस सांसद संजय निरुपम ने चरित्र हनन करते हुए स्मृति को संबोधित करते हुए कहा “कल तक आप पैसे के लिए ठुमके लगा रही थीं और आज आप राजनीति सिखा रही हैं.
चैनल ने कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया था।

भाजपा सांसद स्मृति ईरानी V/S कांग्रेस सांसद संजय निरुपम


संजय निरुपम की सफाई

संजय निरुपम का कहना था कि स्मृति ईरानी पूरे मामले को संदर्भ से हटकर ले रही हैं। लोगों को पूरी चर्चा में देखकर संदर्भ को समझना चाहिए।

चेनल की प्रतिक्रिया

चेनल कार्यक्रम को कुछ देर के लिए रोका गया|
जिस समाचार चैनल पर संजय निरूपम ने यह बात कही थी उसने भी पुनः माफी मांगते हुए यह कहा है कि निरुपम की भाषा से वे कतई सहमत नहीं हैं.यूँ तो चैनल पर लाइव शो का संचालन कर रहे एंकर ने संजय निरूपम को व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने से परहेज़ करने को कहा लेकिन भाजपा की राज्य सभा सदस्य स्मृति ईरानी के साथ नोक झोंक में लगे निरुपम ने एंकर को नज़र अंदाज़ कर दिया.

भाजपा की प्रतिक्रिया

भाजपा की तरफ से कहा गया की निरुपम की टिपण्णी इतनी दुर्भाग्य पूर्ण थी की उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता और इसलिए आगे से पार्टी का कोइ भी प्रवक्ता ऐसे किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लेगा जहाँ निरुपम मौजूद हो| ईरानी ने निरुपम को एक लीगल नोटिस भी भेजा था। मुंबई में युवा और महिला मोर्चा ने रैली निकालकर कांग्रेस सांसद से इस्तीफे की मांग की थी।भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि इस मामले में अगर सोनिया गांधी कोई कदम नहीं उठातीं तो पार्टी उनके खिलाफ प्रदर्शन करेगी।

एल के आडवानी के ब्लॉग से:पाठ्यक्रम में योगी श्री नारायण गुरु- के प्रेरणादाई संघर्ष को भी जोड़ें

नव वर्ष के स्वागत में एन डी ऐ के सर्वोच्च नेता एल के आडवानी ने अपने ब्लॉग में मौजूदा शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल इतिहास के पन्नो में केरल के सर्वमान्य योगी तथा सिध्द श्री नारायण गुरु- के अस्पृश्यता और जातिवाद के विरुध्द प्रेरणादाई अथक संघर्ष को भी जोड़ कर पाठ्यक्रम में एम पूंजी के साथ मनुष्यों का निर्माण किये जाने पर जोर दिया है|
प्रस्तुत है एल के अडवाणी के ब्लाग से उद्दत उनके विचार

एल के आडवानी के ब्लॉग से:

नव वर्ष की शुरुआत हो चुकी है। मुझे इसकी प्रसन्नता है कि दिसम्बर, 2012 के अंतिम दिन मैं केरल में था और एक महान योगी तथा सिध्द श्री नारायण गुरु-अस्पृश्यता और जातिवाद के विरुध्द जिनके अथक संघर्ष की महात्मा गांधी ने भी प्रशंसा की-की पुण्य स्मृति से जुड़े तीर्थस्थल शिवगिरी जाने का सौभाग्य मिला।
श्री नारायण गुरु का जन्म ऐसे समय पर हुआ जब अस्पृश्यता का अपने घृणित रुप में चलन था। ऐसी भी गलत धारणा प्रचलित थी कि कुछ लोगों की छाया भी अन्यों को अपवित्र कर देती थी। एक समान आराध्य और धर्म को मानने वाले लाखों श्रध्दालुओं में से कुछ को मंदिर में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था।
मुझे स्मरण आता है कि तिरुअनंतपुरम से लगभग 45 किलोमीटर दूर वरकला स्थित शिवगिरी मठ में मुझे 1987 में आमंत्रित किया गया था। सन् 1932 से प्रत्येक वर्ष होने वाले तीन दिवसीय समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में मुझे बुलाया गया था। खराब मौसम के चलते तिरुअनंतपुरम जाने वाली विमान सेवा रद्द हो गई थी और मैं नहीं पहुंच सका। शिवगिरी, वरकला पहाड़ियों में स्थित है जहां गुरु (नारायण) के अनुयायी लाखों की संख्या में उनकी समाधि, और उनके द्वारा स्थापित शारदा (सरस्वती) मंदिर के दर्शन करने पहुंचते हैं। शिवगिरी में सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करने से पूर्व श्री नारायण गुरु ने अरुविप्पुरम में शिव मंदिर स्थापित किया। अत: अब 1987 में मैं वहां नहीं पहुंच सका तो किसी तरह अगले वर्ष मैं अरुविप्पुरम की यात्रा कर सका। इसलिए इस वर्ष अपने उद्धाटन भाषण की शुरुआत मैंने पीताम्बर वस्त्र धारण किए विशाल संख्या में उपस्थित श्रध्दालुओं से इस क्षमा याचना के साथ की कि मैं इस पवित्र स्थल पर 25 वर्ष बाद पहुंचा हूं।
इस तीन दिवसीय आयोजन की श्री नारायण गुरु ने योजना बनाई थी और 1928 में उनकी मृत्यु से पूर्व इसे घोषित किया गया। यह प्रत्येक वर्ष 30,31 दिसम्बर और 1 जनवरी को आयोजित किया जाता है। 30 दिसम्बर को इस आयोजन की औपचारिक शुरुआत राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा की गई। दूसरे दिन के तीर्थदनम सम्मेलन, के इस वर्ष का उद्धाटन मुझे करने को कहा गया था। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री वायलर रवि ने की। अंतिम दिन अनेक प्रमुख विद्वानों ने श्री नारायण गुरु द्वारा प्रतिपादित आचार संहिता (Code of Ethics) के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
अपने भाषण में मैंने एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चाण्डी द्वारा की गई घोषणा कि 2013 से श्री नारायण गुरु की शिक्षाओं को केरल राज्य में स्कूली पाठयक्रम में जोड़ा जाएगा, का स्वागत किया।
वस्तुत: यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय विद्यालयों में इतिहास की पढ़ाई अधिकांशतया राजाओं, उनके वंश, उनके युध्दों और शोषण पर ही केंद्रित रहती है। हमारे विध्दानों, साधु-संतो के अविस्मरणीय योगदान से सामान्यतया बच्चों को अक्सर इस आधार पर वंचित रखा जाता है कि एक सेकुलर देश में धर्म वर्जित कर्म है। यह एक बेहूदा दृष्टिकोण है। अत: शिवगिरी में अपने भाषण में मैंने केंद्रीय मंत्री वायलर रवि से अनुरोध किया कि केरल द्वारा की गई पहल को केंद्रीय और अन्य राज्यों में भी अपनाया जाए। यदि स्वामी दयानन्द सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द जैसे संतों की शिक्षाओं को पाठयक्रमों का सामान्य हिस्सा बना दिया जाए तो स्कूली पढ़ाई का स्तर बढ़ेगा।

प्रवासी भारतीय मंत्री श्री रवि ने कहा कि वे इस विषय को प्रधानमंत्री के ध्यान में लाएंगे।

उस दिन के अपने सम्बोधन में मैंने स्मरण किया कि स्कूल में पढ़ते समय हमें पता चला कि किसी विद्यार्थी की प्रतिभा के स्तर का आधार इस से आंका जाता था कि उसका ‘बौध्दिक स्तर‘ (इन्टेलिजेन्स क्वोशन्ट) कितना उपर या नीचे है। बाद में संयोग से एक पुस्तक ‘इ क्यू‘ यानी ‘भावात्मक स्तर‘ (इमोशनल क्वोशन्ट) पढ़ने पर मुझे लगा कि किसी के निजी व्यक्तित्व को परखने के लिए ‘बौध्दिक स्तर‘ (इन्टेलिजेंस क्वोशन्ट) महत्वपूर्ण होगा परन्तु उसका इ क्यू यानी ‘भावात्मक स्तर‘ पर भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। ‘भावात्मक स्तर‘ से तात्पर्य यह है कि कैसे एक व्यक्ति क्रोध, द्वेष इत्यादि जैसे भावों को ग्रहण करता है। उस दिन मैंने कहा कि जो केरल ने किया है और जो मैंने देशभर के शैक्षणिक संस्थानों को करने के लिए अनुरोध किया, कुछ ऐसा है जो हमारे सभी देशवासियों का ‘आध्यात्मिक स्तर‘ (स्पिरिचवल क्वोशन्ट) भी बढ़ाएगा। एस क्यू (स्पिरिचवल क्वोशन्ट) धारणा गढ़ते समय मेरे मन में किसी धर्म या पंथ का विचार नहीं था, मैं तो सिर्फ उन नीतिपरक और नैतिक मूल्यों के बारे में सोच रहा था जो एक विद्यार्थी अपने संस्थान से ग्रहण कर सकता है।

सन् 1902 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व स्वामी विवेकानन्द जी ने टिप्पणी की थी कि देश को एक ऐसी मनुष्य निर्माण मशीन की जरुरत है जो एम पूंजी के साथ मनुष्यों का निर्माण कर सके। उनके दिमाग में ऐसे मनुष्य रहे होंगे जो आइ क्यू, इ क्यू और एस क्यू सम्पन्न हों यानी वे मनुष्य जो अपवाद रुप उच्च चरित्र और असाधारण योग्यता तथा प्रतिभा सम्पन्न हो।
यदि हमारे शैक्षणिक संस्थान स्वामी विवेकानन्द द्वारा विचारित मनुष्य निर्माण मशीनरी को अमल में लाने में सफलता प्राप्त करते हैं तो यह देश के लिए अनुकरणीय सेवा होगी।
***

शिवगिरी की यात्रा की पूर्व संध्या पर, तिरुअनंतपुरम में ही, वर्षों से मेरे पार्टी सहयोगी और श्री वाजपेयी की सरकार में मेरे मंत्रिमण्डलीय सहयोगी श्री ओ. राजागोपालजी के सार्वजनिक जीवन में पचास वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। केरल यूनिवर्सिटी के खचाखच भरे सीनेट सभागार में सभी वक्ताओं ने केरल के हमारे नेता की योग्यता, प्रामाणिकता और एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री के रुप में केरल के कल्याण के लिए दिए गए योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। लेकिन मैं महत्वपूर्ण समझता हूं उस दिन राजगोपालजी का अभिन्न्दन करने आने वाले नेताओं की उपस्थिति को। मंच पर समूचे राजनीतिक और सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में, मैंने सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं से दलगत दायरों से ऊपर एकजुट होकर तथा ईमानदारीपूर्वक भारत को दुनिया में अग्रणी बनाने के लिए काम करने का अनुरोध किया। विपक्ष के नेता वी.एस. अच्युतानन्दन ने मुख्य भाषण देते हुए कहा कि यद्यपि राजनीति में वह और श्री राजगोपाल एक-दूसरे के विरोधी धु्रव पर हैं, परन्तु तब भी वे गहरे मित्र हैं। हालांकि, माकपा और भाजपा ने आपातकाल के विरुध्द संघर्ष की छोटी अवधि में मिलकर काम किया, और इस अवधि के दौरान वह तथा श्री राजगोपाल कारावास में एक साथ बंदी थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता गांधी स्मारक निधि के चेयरमैन पी. गोपीनाथन नायर ने की। उनके अलावा सम्बोधित करने वालों में थे स्वास्थ्य मंत्री वी. एस. शिवाकुमार, भाकपा के राज्य सचिव पानियन रविन्द्रन, कवि ओ.एन.वी. कुरुप, महापौर के. चंद्रिका, भाजपा के वरिष्ठतम सहयोगी परमेश्वरन, राज्य भाजपा के अध्यक्ष वी. मुरलीधरन, केरल कांग्रेस के नेता वी. सुरेन्द्रन पिल्लई, साइरो-मलानकरा कैथोलिक चर्च ऑक्सिलॅरी बिशप सैम्युल मार इरेनियस, स्वामी तत्वारुपानंदा और एन आई एम एस मेडीसिटी के मैंनेजिंग डायरेक्टर एम.एस. फैजल खान-भी थे।

प्रतिभाओं के धनी शशि थरूर ने अब गैंग पीडिता से जुड़े एक नए विवाद को जन्म दिया

प्रतिभाओं के धनी शशि थरूर का विवादों से पुराना नाता है| थरूर ने आज

Shashi tharoor

गैंग पीडिता से जुड़े एक नए विवाद को जन्म दिया है | पुनः केन्द्रीय मंत्री[ मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री ] बने शशि थरूर ने फिर एक ज्वलंत मुद्दे पर विवाद को जन्म दे दिया है| मंगलवार को अपने ट्‍वीट में उन्होंने बलात्कार के खिलाफ बनाए जाने वाले कड़े कानून का नाम गैंग रेप पीड़िता के नाम पर रखे जाने की वकालत कर डाली है|उन्होंने कहा है कि पता नहीं क्यों मौत के बाद अब दिल्ली सामूहिक बलात्कार ‍की शिकार लड़की का नाम छिपाया जा रहा है। हालांकि उनके बयान से कांग्रेस ने पल्ला झाड़ लिया है।थरूर ने कहा कि पीड़िता का नहीं छिपाया जाना चाहिए और हालांकि उन्होंने कहा कि इसमें लड़की के माता-पिता की सहमति भी होना चाहिए।
महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि थरूर का कहना गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए।
भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि भाजपा इसे सही नहीं मानती, हम इसका विरोध करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की भी गाइड लाइन है कि पीड़ित का नाम नहीं बताया जाना चाहिए।
थरूर की पार्टी कांग्रेस ने अपने मंत्री के टिप्पणी से पल्ला झाड़ लिया है। पार्टी प्रवक्ता राशिद अल्बी ने कहा कि यह थरूर की निजी टिप्पणी हो सकती है। पार्टी इससे इत्तफाक नहीं रखती। वहीं सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि कानून को चुस्त-दुरुस्त करना चाहिए, यही पीड़ित लड़की को सच्ची श्रद्धांजलि होगी
गौरतलब है कि पीडिता कि और उसके परिवार की निजता को बनाए रखने के लिए पीडिता का नाम सार्वजनिक नहीं किया जा सकता मगर समाज में बुराई से लड़ने के लिए चेतना जगाना जरूरी है और चेतना जगाने के लिए एक आदर्श को प्रस्तुत करने के सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं|

पॉप सिंगर हनी सिंह के अश्लील, उत्तेजक और अभद्र कार्यक्रम रद्द मुकद्दमा भी दर्ज़

पॉप सिंगर हनी सिंह के अश्लील, उत्तेजक और अभद्र कार्यक्रम रद्द मुकद्दमा भी दर्ज़

दिल्ली में हुए गैंग रैप के बाद उठी आक्रोश की सुनामी में अश्लीलता बहने लगी है बेशक अभी अपराधों पर प्रत्यक्ष रोक नही लगी है मगर सामाजिक तौर पर अपराध उत्प्रेरक अश्लीलता,फ्हूड़ता,उत्तेजकता पूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ भी आवाज़ उठने लग गई है इसके फलस्वरूप हनी सिंह के कार्यक्रमों के विरुद्ध केस दर्ज़ होने लग गए हैं|
वरिष्ठ आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने लखनऊ के गोमतीनगर थाने में गायक हनी सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा (आईपीसी) 292, 293 और 294 के तहत मुकदमा दर्ज कराया है।ठाकुर ने दर्ज शिकायत में कहा कि हनी सिंह के लिखे और गाए गए ‘मैं हूं बलात्कारी’ और ‘केंदे पेचायिया’ जैसे गाने अत्यंत अश्लील, उत्तेजक और अभद्र हैं और समाज में महिलाओं के प्रति असम्मान और गंभीर अपराध बढ़ाने के उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।अश्लील, उत्तेजक और अभद्र होने के कारण भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं ।
पंजाबी पॉप की दुनिया में हनी सिंह एक बड़ा नाम है।उनके लाइव शो की डिमांड केवल इंडिया में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी होती है। अब तो हनी सिंह बॉलीवुड के लिए भी गा रहे हैं।पंजाबी के अलावा कॉकटेल + खिलाड़ी ७८६+ रेस-२+ सन ऑफ सरदार जैसी हिंदी फिल्मों में भी गाने गाए हैं। ।हनी सिंह गुड़गांव में भी नये साल के उपलक्ष में एक शो करने जा रहे हैं लोगों ने उस शो को भी रद्द करने की मांग की इस मांग का आदर किया गया
गायक हनी सिंह का जन्म पंजाब के होशियारपुर में 15 मार्च, 1984 को हुआ था। वह देशी हिप हॉक, पंजाबी भांगड़ा गाने गाते हैं। गायक व एक्टर होने के साथ ही वह प्रोड्यूसर भी हैं। उन्होंने अपना करियर 2006 से शुरू किया और २०१२ में बॉलीवुड के सबसे महंगे गायक बन गए |

नव वर्ष की सबको बधाई+मुबारक और कांग्रेचुलेशंस Happy New Year

Happy New Year


नव वर्ष में सभी का आगमन शुभ हो+लाभकारी हो+मंगलमय हो।
सौभाग्य से हमारी पीडी को नेटवर्क का ऐसा वरदान मिला है
जिसके माध्यम से जाति +धर्म+छेत्र और छत्रप के बगैर
भी मानवीय मुद्दों को लेकर देश को हिलाया जा रहा है
इस वर्ष शांत स्वभाव में मन मंदिर में मानवता की मूर्ती
धारण करें और निस्वार्थ भाव में राष्ट्र हित में चिंतन करें

कांग्रेस के १२७वे स्थापना दिवस पर बलात्कारियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने और पीडिता को इलाज़ के लिए प्रतिबद्दता दर्शाई

कांग्रेस के १२७वे स्थापना दिवस

कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने जोर देकर कहा कि बर्बर सामूहिक बलात्कार मामले के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने में समय व्यर्थ नहीं किया जाए, जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
कांग्रेस मुख्यालय में आज पार्टी के 127वें स्थापना दिवस के अवसर पर पार्टी का झंडा फहराया |इस अवसर पर मीडिया से बात करते हुए पार्टी अध्यक्षा श्री मति सोनिया गाँधी और पी एम् डाक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि वे भी 16 दिसंबर की बर्बर घटना को लेकर देश में पैदा गुस्से और रोष में उनके साथ हैं।
इस मौके पर अक्सर नव वर्ष की शुभकामनाएं देने वाली श्रीमति सोनिया ने इस बार ऐसा नहीं किया और कहा कि हमारा ध्यान उस युवा महिला पर है, जो बर्बर हमले के बाद अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही है।
सोनिया ने 24, अकबर रोड पर पार्टी के झंडे को फहराने के बाद भावुक आवाज में कहा कि आज हमारी एकमात्र इच्छा यह है कि वह (पीड़ित) उबरे और हमारे पास वापस आए और इस तरह के बर्बर कृत्य को करने वाले अपराधियों को न्याय के कठघरे में लाने के लिए समय व्यर्थ नहीं किया जाए।
सोनिया के साथ खड़े प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि हमारी सरकार दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। बलात्कार के आरोपियों की शीघ्र सुनवाई को लेकर सरकार की पहल के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने भारत ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक समिति बनाई है, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित कानूनों को आधुनिक बनाने के लिए तरीके सुझाएगी।
मनमोहन सिंह ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि हम जघन्य अपराध पर देश के गुस्से और रोष में उनके साथ हैं। हमारी प्रार्थनाएं बहादुर युवती के साथ हैं और उसका सर्वश्रेष्ठ संभव इलाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश उषा मेहरा को यह पता करने के लिए नियुक्त किया गया है कि क्या घटना के बाद की घटनाक्रम में किसी की खामी या लापरवाही रही।

एल के अडवाणी के नज़रिए से तवलीन सिंह की १० जनपथी” दरबार” L K Advani On “Darbar” Of TAVLEEN SINGH

एल के अडवाणी ने अपने ब्लाग में तवलीन सिंह की पुस्तक दरबार के हवाले से इंडिया गेट+और रायसीना हिल्स पर हो रही दमनात्मक कार्यवाही को आज़ादी के विरुद्ध आपातकालीन युग की शुरुआत बताने का प्रयास किया है|उन्होंने इसके लिए पुस्तक में से आपातकाल के दौरान रैली में दिए गए अपने नेता अटल बिहारी वाजपई की इस टिपण्णी का भी उल्लेख किया|

एल के अडवाणी के नज़रिए से तवलीन सिंह की १० जनपथी” दरबार”


अडवाणी ने ब्लाग के टेलपीस (पश्च्यलेख)में कहा है की मेरा मानना है कि तवलीन की पुस्तक के पाठक अध्याय पांच शीर्षक 1977 चुनाव को बड़े चाव से पढ़ेंगे-विशेषकर इस चुनावी भाषण के उदाहरण को, सर्वश्रेष्ठ वाजपेयी (Vintage Vajpayee)।
जब दिल्ली की दीवारों पर पहला पोस्टर लगा कि रामलीला मैदान में एक रैली होगी जिसे प्रमुख विपक्षी नेता सम्बोधित करेंगे, तो हम सभी को लगा कि यह एक मजाक है। स्टेट्समैन के रिपोरटर्स कक्ष में यह धारणा थी कि यदि पोस्टर सही भी हैं तो रैली फ्लॉप होगी क्योंकि लोग इसमें भाग लेने से डरेंगे। अभी भी आपातकाल प्रभावी था और पिछले अठारह महीनों से बना भय का वातावरण छंटा नहीं था।
चीफ रिपोर्टर राजू, सदैव की भांति निराशावादी था और उसने कहा कि श्रीमती गांधी को कोई हरा नहीं सकता, इसलिए इसमें कोई दम नहीं है। ‘यहां तक कि यह विपक्ष की रैली है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यदि उन्हें अपनी जीत के बारे में थोड़ा भी संदेह होता तो वह चुनाव नहीं कराती‘।
‘हां, लेकिन वह गलती तो कर सकती है,’ मैंने कहा। ‘मैंने सुना है कि उनका बेटा और उत्तराधिकारी इसके विरुध्द थे। उन्होंने बताया कि वह हार सकती हैं।‘ अनेक वर्ष बाद जब संजय गांधी के अच्छे दोस्त कमलनाथ दिल्ली में कांग्रेस सरकार में केबिनेट मंत्री थे, से मैंने पूछा कि क्या यह सही है कि संजय ने अपनी मां के चुनाव कराने सम्बन्धी निर्णय का विरोध किया था, कमलनाथ ने इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने चुनावों के बारे में सुना तब संजय और वह श्रीनगर में एक साथ थे और इस पर संजय काफी खफा थे।
जब हम मैदान पर पहुंचे तो हमने दखा कि लोग सभी दिशाओं से उमड़ रहे हैं। मगर अंदर और ज्यादा भीड़ थी। इतनी भीड़ मैंने कभी किसी राजनीतिक रैली में नहीं देखी थी। भीड़ रामलीला मैदान के आखिर तक और उससे भी आगे तक भरी हुई थी।
लगभग शाम को 6 बजे विपक्षी नेता सफेद एम्बेसडर कारों के काफिले में पहुंचे। एक के बाद एक ने मंच पर उबाऊ, लम्बे भाषण दिए कि उन्होंने जेल में कितने कष्ट उठाए। हिन्दुस्तान टाइम्स के अपने एक सहयोगी को मैंने कहा यदि किसी ने कोई प्रेरणादायक भाषण देना शुरु नहीं किया तो लोग जाना शुरु कर देंगे। उस समय रात के 9 बज चुके थे और रात ठंडी होने लगी थी यद्यपि बारिश रुक गई थी। उसने मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया ‘चिंता मत करो, जब तक अटलजी नहीं बोलेंगे, कोई उठकर नहीं जाएगा।‘ उसने एक छोटे से व्यक्ति की ओर ईशारा किया जिसके बाल सफेद थे और उस शाम के अंतिम वक्ता थे। ‘क्यों?’ ‘क्योंकि वह भारत के सर्वश्रेठ वक्ता हैं।‘
जब अटलजी की बारी आई उस समय तक रात के 9.30 बज चुके थे और जैसे ही वह बोलने के लिए खड़े हुए तो विशाल भीड़ खड़ी हो गई और तालियां बजानी शुरु कर दी: पहले थोड़ा हिचक कर, फिर और उत्साह से उन्होंने नारा लगाया, ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद, अटल बिहारी जिंदाबाद!‘ उन्होंने नारे का जवाब नमस्ते की मुद्रा और एक हल्की मुस्कान से दिया। तब उन्होंने भीड़ को शांत करने हेतु दोनों हाथ उठाए और एक मजे हुए कलाकार की भांति अपनी आंखे बंद कीं, और कहा बाद मुद्दत के मिले हैं दिवाने। उन्होंने चुप्पी साधी। भीड़ उतावली हो उठी। जब तालियां थमीं उन्होंने अपनी आंखें फिर खोलीं और फिर लम्बी चुप्पी के बाद बोले ‘कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।‘ तालियों की गड़गडाहट लम्बी थी और इसकी अंतिम पंक्ति जो उन्होंने बाद में मुझे बताई थी, तभी रची: ‘खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने।‘ अब भीड़ उन्मत्त हो चुकी थी।
रात की ठंड बढ़ने और फिर से शुरु हुई हल्की बूंदाबांदी के बावजूद कोई भी अपने स्थान से नहीं हटा। उन्होंने अटलजी को पूरी शांति के साथ सुना।
सरल हिन्दी में, वाकपटुता से अटलजी ने उन्हें बताया कि क्यों उन्हें इंदिरा गांधी को वोट नहीं देना चाहिए। उस रात दिए गए भाषण की प्रति मेरे पास नहीं है और वैसे भी वह बिना तैयारी के बोले थे, लेकिन जो मुझे याद है उसे मैं यहां सविस्तार बता सकती हूं। उन्होंने शुरु किया आजादी, लोकतांत्रिक अधिकारों, सत्ता में बैठे लोगों से असहमत होने का मौलिक अधिकार, जब तक आपसे ले लिए नहीं जाते उनका कोई अर्थ नहीं होता। पिछले दो वर्षों में यह न केवल ले लिए गए बल्कि जिन्होंने विरोध करने का साहस किया उन्हें दण्डित किया गया। जिस भारत को उसके नागरिक प्यार करते थे, अब मौजूद नहीं था। उन्होंने यह कहते हुए जोड़ा कि यह विशाल बंदी कैम्प बन गया है, एक ऐसा बंदी कैंप जिसमें मनुष्य को मनुष्य नहीं माना जाता। उनके साथ इस तरह से बर्ताव किया गया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुध्द काम करने को बाध्य किया गया जोकि एक मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के विरुध्द नहीं किया जाना चाहिए। विपक्षी नेता (उन्होंने कहा ‘हम‘) जानते हैं कि भारत की बढ़ती जनसंख्या के बारे में कुछ करने की जरुरत है; वे परिवार नियोजन का विरोध नहीं करते, लेकिन वे इसमें भी विश्वास नहीं करते कि मनुष्यों को जानवरों की तरह ट्रकों में डालकर उनकी इच्छा के विरुध्द उनकी नसबंदी कर दी जाए और वापस भेज दिया जाए। इस टिप्पणी पर तालियां बजीं और बजती रहीं, बजती रहीं तथा चुनाव वाले दिन ही मुझे समझ आया कि यह क्यों बज रहीं थीं।
अटलजी के भाषण समाप्ति के रुकी भीड़ ने और विपक्षी नेता अपनी सफेद एम्बेसेडर कारों में बैठे तथा भीड़ को छोड़ चले गए मानों तय किया था कि प्रेरणास्पद भाषण सुनने के बाद तालियों से भी ज्यादा कुछ और करना है। इसलिए जब पार्टी कार्यकर्ता चादर लेकर चंदा इक्ठ्ठा करते दिखाई दिए तो सभी ने कुछ न कुछ दिया। जनवरी की उस सर्द रात को मैंने देखा कि रिक्शा वाले और दिल्ली की सड़कों पर दयनीय हालत में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर भी जो दे सकते थे, दे रहे थे तो पहली बार मुझे लगा कि इंदिरा गांधी के चुनाव हारने की संभावना हो सकती है।

जेड सिक्युरिटी हटा कर सेना अपने पूर्व जनरल वी के सिंह को सहायक उपलब्ध करा कर शिष्टाचार निभाएगी

Retd.General V K Singh

आर्मी जनरल से सोशल एक्टिविस्ट बने पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह से बेशक जेड श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था हटा लेने की घोषणा कर दी गई है मगर भारतीय सेना अपने सेना के ‘‘शिष्टाचार’’ को निभाते हुए अपने इस अधिकारी को सेना कुछ सहायक उपलब्ध कराएगी जो रोजाना के कामकाज में उनकी मदद करेंगे ।
समाचार एजेंसी भाषा ने सेना के सूत्रों के हवाले से बताया है कि जनरल वीके सिंह को सहायक के रूप में कुछ कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएंगे जो रोजाना के कामकाज में उनकी सहायता करेंगे । यह शिष्टाचार पूर्व सेना प्रमुखों और रेजीमेंटों के पूर्व कर्नलों को मिलता है । लेकिन श्री सिंह के साथ सुरक्षाकर्मी नहीं होंगे ।

एल के अडवाणी के नज़रिए से तवलीन सिंह की १० जनपथी “दरबार”

पत्रकार तवलीन सिंह द्वारा गांधी परिवार पर लिखित पुस्तक ‘दरबार‘ पर एल के अडवाणी ने अपने ब्लॉग में प्रतिक्रिया देते हुए पुस्तक को अत्यन्त ही रोचक पठनीय बताया है|इस पुस्तक में पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गे राजिव गाँधी के उत्थान और फिर पतनके माध्यम से 10 जनपथ[कांग्रेस अध्यक्ष] की रहस्यात्मकता या गुप्तता” को उजागर करने का प्रयास किया गया है|

एल के अडवाणी के नज़रिए से तवलीन सिंह की १० जनपथी “दरबार”

प्रस्तुत है अडवानी के ब्लाग से उद्दत दरबार पर उनकी यह प्रतिक्रया ।
तहलका जैसी पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया है कि यह पुस्तक गांधी परिवार के विरूध्द ”पुराने हिसाब किताब चुकाने” के उद्देश्य से लिखी गई एक गपशप है। जबकि दूसरी और दि एशियन एज ने पुस्तक की समीक्षा ‘दिल्ली दरबार के रहस्यपूर्ण वातावरण से पर्दा उठना‘ (Unraveling the mystique of Delhi’s Durbar) शीर्षक से प्रकाशित की है। हालांकि कोई भी इससे इंकार नहीं कर सकता कि तवलीन की नवीनतम पुस्तक अत्यन्त ही रोचक पठनीय है।
‘एशियन एज‘ में समीक्षक अशोक मलिक की यह टिप्पणी बिल्कुल सही है कि अपनी सारी पहुंच के बावजूद राजधानी में राजनीतिक पत्रकार अक्सर लुटियन्स दिल्ली के लिए अंतत: बाहरी ही रहते हैं। कम से कम 10 जनपथ के संदर्भ में यह शत-प्रतिशत सत्य है।
अनगिनत समस्याओं वाला भारत एक विशाल देश है। संविधान और कानून सरकार को देश का शासन प्रभावी ढंग से चलाने की सभी जिम्मेदारी प्रदान करते हैं। जैसाकि सभी लोकतंत्रों में लोकतांत्रिक तंत्र का मुखिया प्रधानमंत्री होता है। लेकिन देश में सभी जानते हैं कि आज के भारत में मुखिया प्रधानमंत्री नहीं अपितु कांग्रेस अध्यक्ष हैं। यही वह स्थिति है जो इन दिनों देश की अनेक समस्याओं की मूल जड़ है।
यह पुस्तक अपने पाठकों को बताती है कि एक समय था जब इसकी लेखक का न केवल राजीव गांधी के साथ अपितु श्रीमती सोनिया गांधी के साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध था। तब अचानक यह निकटता समाप्त हो गई। अशोक मलिक लिखते हैं : तवलीन की पुस्तक हमें ”10 जनपथ की रहस्यात्मकता या गुप्तता” को समझने में सहायता करती है।
मलिक द्वारा ”इंदिरा गांधी हत्याकाण्ड में राजीव के और सोनिया के सामाजिक मित्रों को फंसाने के विचित्र दुष्टताभरे अभियान” की ओर इंगित करने ने ‘मुझे पुस्तक के अध्याय 14 के उन सभी आठ पृष्ठों को पढ़ने को बाध्य किया‘ जिनपर मलिक की टिप्पणी आधारित है। तवलीन से भी इस सम्बन्ध में इंटेलीजेंस ब्यूरो (आई0बी0) ने पूछताछ की थी। इस प्रकरण के सम्बन्ध में तवलीन का अंतिम पैराग्राफ हमारी गुप्तचर एजेंसियों की काफी निंदा करता है:

”जांच के अंत में, हमारी गुप्तचर एजेंसियों के स्तर के बारे में मुझे गंभीर चिंता हुई। इसलिए मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब कुछ महीने बाद यह जांच कि भारत के प्रधानमंत्री की हत्या में कोई बड़ा षडयंत्र था, को चुपचाप समाप्त होने दिया गया।”
312 पृष्ठों वाले इस संस्मरण की शुरूआत में लेखक का चार पृष्ठीय ‘नोट‘ है। इस पुस्तक में तवलीन सिंह की टिप्पणियों से आप असहमत हो सकते हैं और उनके कुछ निष्कर्षों को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन मुझे उनके इस शुरूआती ‘नोट‘ में दम लगता है जिसे इस अंतिम पैराग्राफ में सारगर्भित ढंग से समाहित किया गया है:
”दरबार लिखना मुश्किल था। राजीव गांधी की मृत्यु के तुरंत बाद मैंने इसे लिखना शुरू किया। मैं उन्हें तब से जानती थी जब वह एक राजनीतिज्ञ नहीं थे और अपने को मैंने इस अनोखी स्थिति में पाया कि उन्हें यह बता सकूं कि कैसे भारतीय इतिहास में सर्वाधिक प्रचण्ड बहुमत वाला प्रधानमंत्री अंत में कैसे निराशाजनक स्थिति में पहुंचा। केवल इसलिए नहीं कि मैं भी उस छोटे से सामाजिक ग्रुप का हिस्सा थी जिसमें वह भी थे, लेकिन इसलिए कि एक पत्रकार के रूप में मेरा कैरियर इस तरह से बदला कि मैंने उस भारत को देखा जो राजीव के एक राजनीतिज्ञ के रूप में लगभग समानांतर चलता रहा था। तब मुझे लगा कि उन्होंने भारत की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया लेकिन जब मैं इस पुस्तक को लिखने बैठी तो मुझे अहसास हुआ कि वही अकेले नहीं थे जिन्होंने भारत को शर्मिंदा किया। एक समूचे सत्तारूढ़ वर्ग ने ऐसा किया। वह सत्तारूढ़ वर्ग जिससे मैं भी सम्बन्धित हूं।

जैसे कहानी आगे बढ़ती है यह मानों मेरे अपने जीवन का दर्पण है, राजनीतिज्ञ के रूप में राजीव के संक्षिप्त जीवन और कैसे वंशानुगत लोकतंत्र के बीज बोए गए-का ही यह एक संस्मरण नहीं है बल्कि एक पत्रकार के रूप में मेरा भी है। मैंने पाया कि पत्रकारिता की स्पष्ट दृष्टि ने उस देश को समझने के मेरे नजरिए को बदला जिसमें मैं अपने सारे जीवन भर रही हूं। और इसने मूलभूत रूप से उस नजरिए को बदला जिसमें मैं उन लोगों को देख सकी जिनके साथ मैं पली-बढ़ी। मैंने देखा कि कैसे वे भारत से अलिप्त हैं, उसकी संस्कृति और इतिहास उनके लिए कैसे विदेशी हैं, और इसी के चलते वे पुनर्जागरण और परिवर्तन लाने में असफल रहे। मैंने देखा कि एक पत्रकार के रूप में मेरे जीवन ने उन द्वारों को खोला जिनसे मुझे लगातार शर्म महसूस हुई कि कैसे मेरे जैसे लोगों ने भारत के साथ विश्वासघात किया है। मैं मानती हूं कि इसी के चलते भारत को उसके सत्तारूढ़ वर्ग ने शर्मिंदा किया है और वह वैसा देश नहीं बन पाया जैसा उसे बनना चाहिए था। यदि हम कम विदेशी होते और भारत की भाषाओं और साहित्य की महान संपदा, राजनीति और शासन सम्बन्धी उसके प्राचीन मूलग्रंथों और उसके ग्रंथों के बारे में और ज्यादा सचेत होते तो हम अनेक चीजों में परिवर्तन कर पाते लेकिन हम असफल रहे और अपने बच्चों कीे उनके ही देश में अपनी तरह, विदेशियों की तरह पाला। सभी विदेशी चीजों पर मंत्रमुग्ध और सभी भारतीय चीजों का तिरस्कार।
एक नया सत्तारूढ़ वर्ग धीरे से पुराने का स्थान ले रहा है। एक नयी, अभद्र राजनीतिज्ञों का वर्ग सत्ता पर नियंत्रण हेतु सामने आ रहा है। किसानों और चपरासियों के बच्चे और उन जातियों जो कभी अस्पृश्य माने जाते थे, की संतानें भारत के कुछ बड़े प्रदेशों पर शासन कर चुके हैं। लेकिन पुराने सत्तारूढ़ की बराबरी की चेष्टा में वे अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उन्हें पश्चिम के विश्वविद्यालयों में भेजते हैं। इसमें भी कोई हर्जा नहीं है बशर्ते कि वे उन्हें अपनी भाषाओं और संस्कृति से विमुख नहीं करते हों।
एक भारतीय पुनर्जागरण की संभावना, जैसाकि पहली पीढ़ी के उन भारतीयों जो उपनिवेश के बाद के भारत में पली-बढ़ी है, हमारी हो सकती थी और सिमटती और दूर होती जा रही है। सत्तारूढ़ वर्ग के हाथों में एक राजनीतिक हथियार-वंशवाद, देश जिसकी आत्मा पहले से ही शताब्दियों से गहरे ढंग से दागदार है के नए उपनिवेश का मुख्य स्त्रोत बनता जा रहा है। यह वह मुख्य कारण है जिसके चलते तेजी से विस्तारित और फैलते शिक्षित मध्यम वर्ग का लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं से मोहभंग होता जा रहा है।
तवलीन की इन पंक्तियों ने मुझे लार्ड मैकाले द्वारा फरवरी 1835 में ब्रिटिश संसद में की गई टिप्पणियों का स्मरण करा दिया:

”मैंने पूरे भारत की यात्रा की और ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जो कि भिखारी हो या चोर हो। इस तरह की संपत्ति मैंने इस देश में देखी है, इतने ऊंचे नैतिक मूल्य, लोगों की इतनी क्षमता, मुझे नहीं लगता कि कभी हम इस देश को जीत सकते हैं, जब तक कि हम इस देश की रीढ़ को नहीं तोड़ देते, जो कि उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में है। इसलिए मैं प्रस्ताव करता हूं कि हमें इसकी पुरानी और प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था, इसकी संस्कृति को बदलना होगा। इसके लिए यदि हम भारतीयों को यह सोचना सिखा दें कि जो भी विदेशी है और अंग्रेज है, वह उसके लिए अच्छा और बेहतर है, तो इस तरह से वे अपना आत्मसम्मान खो देंगे, अपनी संस्कृति खो देंगे और वे वही बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं-एक बिल्कुल गुलाम देश।”
मैकाले द्वारा अपनाई गई उपनिवेशवादी नीति अंग्रेजों द्वारा भारत लागू शिक्षा व्यवस्था में विद्यमान थी। इसका प्रभाव स्वतंत्रता के बाद भी बना हुआ है। वे लोग जो केवल हिंदी या कोई भारतीय भाषा बोलते हैं और अच्छी अंग्रेजी नही बोल पाते, उन्हें हमारे देश में निकृष्ट समझा जाता है। मैंने अक्सर इस तथ्य को समझने के लिए अपना उदाहरण दिया है। मैं अपने जीवन के आरंभिक बीस वर्षों में-जो मैंने सिंध में बिताए-बहुत कम हिंदी जानता था। राजस्थान आने के बाद मैंने परिश्रमपूर्वक इसका अध्ययन किया। लेकिन मुझे वर्ष 1957 में दिल्ली आने पर यह अनुभव हुआ कि अंग्रेजी भारत में उंचा स्थान कैसे रखती है
उदाहरण के लिए, जब भी टेलीफोन की घंटी बजती थी और मैं इसे उठाता था, मेरा पहला वाक्य होता था आज भी है-‘हां, जी’ जिसके जवाब में अक्सर उधर से पूछा जाता था, ‘साहब घर में हैं?’ यह मान लिया जाता था कि घर से कोई नौकर बोल रहा है। और मैं उनसे कहता था, ‘आपको आडवाणी से बात करनी है तो मैं बोल रहा हूं।‘

पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपई का ८८वां जन्म दिन देश भर में मनाया गया:Bharat Ratn For A B Vajpai Demanded

पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपई का ८८ वा जन्म दिन देश भर में मनाया जा रहा है| इस अवसर पर उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किये जाने की मांग की गई है| सेन्ट्रल दिल्ली स्थित उनके निवास पर प्रधान मंत्री डाक्टर मन मोहन सिंह,भाजपा नेता एल के अडवानी,सुषमा स्वराज,नितिन गडकरी,और राजनाथ ने अटल बिहारी वाजपई को जन्म दिन की बधाई दी|
भाजपा शासित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित किये जाने की मांग की है।श्री चौहान ने वाजपेयी के व्यक्तित्व पर आधारित जनसंपर्क विभाग की प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा कि वाजपेयी ऐसे नेता हैं जिनसे सभी प्यार और आदर करते हैं।बताते चलें कि वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को पूर्व रियासत, ग्वालियर में हुआ था, जो अब मध्य प्रदेश का हिस्सा है।
वाजपेयी, भाजपा के पूर्व संगठन भारतीय जन संघ के संस्थापक नेताओं में से एक हैं। वह जनता पार्टी की सरकार में वर्ष 1977 में देश के विदेश मंत्री रहे।
वर्ष 1996 में वह सिर्फ 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने। इसके बाद मार्च 1998 में 13 माह के लिए और फिर अक्टूबर 1999 से मई 2004 के बीच तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने वर्ष 2009 का चुनाव नहीं लड़ा था।आज कल सक्रिय राजनीती से हट कर घर पर ही स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं|
तालकटोरा स्टेडियम में वाजपई जी का जन्म दिन रक्त दान करके मनाया गया
इस मौके पर बरनाला में कार्यकर्ताओं ने सदर बाजार को जोड़ती दो गलियों टूटे वाटे वाली गली व बांसा वाली गली का नाम बदल कर ‘श्री अटल बिहारी वाजपेयी मार्ग’ रख दिया।
इसकी घोषणा भाजपा जिला अध्यक्ष गुरमीत सिंह हंडियाया ने मंगलवार को बरनाला में हुए समारोह को संबोधित करते हुए कही।।
श्री वाजपेयी के 88 वें जन्मदिवस के अवसर पर बलात्कार पीड़ित लड़की को समर्पित रैली के समक्ष अपने संबोधन में पार्टी के वरिष्ठ नेता एम वेंकैया नायडु ने कहा, ‘‘ देश की राजधानी में जो कुछ हो रहा है, वह कानून व्यवस्था के खिलाफ जनता के संचित गुस्से के कारण है। यह केवल इस बलात्कार की घटना के कारण नहीं है।
मेरठ में बी जे पी कार्यकर्ताओं ने हवं करके अपने नेता की लम्बी आयु की कामना की