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राष्ट्रहित मे शोधकार्यों के लिए हो जाये जवानी और अनुभव में प्रतिस्पर्धा

झल्लीगल्लां

Education Policy

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चिंतितशिक्षाविद ओए झल्लेया!हसाडे मुल्क में शिक्षा और शोध पर जो भी खर्च हो रहा है उसका पर्याप्त लाभ देश को नही मिल पा रहा।डॉक्टर/इंजीनियर/ टेक्नोक्रेट्स आदि आदि अनुदान वाले शिक्षण संस्थाओं से महंगी महंगी डिग्रियां लेकर उनका उपयोग जनता के लाभ के लिए नही करते।शोधकर्ता तो (अधिकांश)राजनीति में आने को ही लालायित रहते हैं।होस्टल में जवानी खपाने वाली प्रतिभाओं का राजनीतिक शोषण भी हो रहा है।अब देख तो कोरोना नाशक वैक्सीन के लिए भी रशियाँन स्पुतनिक और अमेरिकन पफिज़र की तरफ देखना पढ़ रहा है।किसान डिग्रियां लेकर भी खेत बेच कर कंक्रीट के जंगल विकसित करने में जुटा है।जनलाभः वाले शोध कुछ व्यवसायियों की चारदीवारी से बाहर केवल उनकी तिजोरी भरने के लिए ही निकाले जाते हैं।
झल्लाभापा जी!राष्ट्रहित मे शोधकार्यों के लिए हो जाये जवानी और अनुभव में प्रतिस्पर्धा
शिक्षाआप जी की गल और उसमे लिपटी पीड़ा वाकई जायज है। लेकिन अनेकों नाम ऐसे हैं जो अपनी शिक्षा और व्यवसाय से पूर्णतया न्याय कर रहे है।डॉ हर्षवर्धन+डॉ महेशशर्मा+मनीषतिवारी+कपिल सिब्बल+रविशंकरप्रसाद जैसे अनेकों नाम गिनाए जा सकते हैं ।फिर भी चूंकि आपने जायज सवाल उठाया है सो झल्लेविचारानुसार सेवानिवृत होने वाले सरकारी/गैर सरकारी लोगों को भी शोध के लिए एक प्लेटफॉर्म दिया जाना चाहिए।हो जाये जवानी और अनुभव में प्रतिस्पर्धा