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सुन्दर नगरी के उपवास स्थल पर ५ अप्रैल को “आप” की सर्व धर्म प्रार्थना सभा:New Card Of AAP

आम आदमी पार्टी[आप] ने एक नए कार्ड का ऐलान किया है|इसके अनुसार कल ५ अप्रैलको उपवास के १४वे दिन सुन्दर नगरी में प्रात दस बजे से सर्व धर्म प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाएगा|
पार्टी प्रवक्ता अस्वति मुरलीधरन के अनुसार सिविल डिसओबेडियंस मूवमेंट के १३ वे दिन आज बिजली पानी के बिलों में भ्रष्टाचार के विरोध में हस्ताक्षर करने वाले असहयोगियों की संख्या ९६०६०३ हो गई है| और आज रात दस बजे तक १० लाख के आंकडे को पार कर लिया जाएगा|

सुन्दर नगरी के उपवास स्थल पर ५ अप्रैल को प्रात दस बजे से "आप" की सर्व धर्म प्रार्थना सभा

सुन्दर नगरी के उपवास स्थल पर ५ अप्रैल को प्रात दस बजे से “आप” की सर्व धर्म प्रार्थना सभा

आप पार्टी प्रवक्ता ने बताया कि सुन्दर नगरी स्थित उपवास स्थल पर कल ५ अप्रैल ,शुक्रवारको सर्व धर्म प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाएगा जिसमे भाग लेने के लिए दिल्ली के सभी वार्डों से लोग आयेंगे|

आन्दोलन के अगले चरण

के लिए ६ अप्रैल को चुना गया है| १९३० कि ६ अप्रैल को महात्मा मोहन दास करम चंद गांधी ने नमक क़ानून को तोड़ने के लिए दांडी मार्च निकाला था |जिस प्रकार उस समय नमक आम आदमी कि पहुँच से दूर कर दिया गया था ठीक उसी प्रकार अब बिजली पानी जैसी आवश्यकता को आम आदमी से दूर करके कुछ लोगों कि जेबें भरने का साधन बना दिया है|इसीलिए महात्मा गाँधी के पद चिन्हों पर चलते हुए २०१३ की ६ अप्रैल को बिजली पानी के काटे गए कनेक्शनों को जोड़ने का अभियान चलाया जाएगा|और आम आदमी को राहत प्रदान की जायेगी|

हेल्थ बुलेटिन

आज सुबह उपवासी नेता के स्वास्थ्य रिपोर्ट इस प्रकार रही:
[१]ब्लड प्रेशर=====१११/७३
[२]पल्स==========६४
[३]शुगर==========१३१
[४]केटोन्स[Ketones]३+
[५] वजन =========५६.५ किलो ग्राम

मुस्लिम महिलाओं को कुरआन और रसूल के बताये मार्ग के प्रति जागरूक करने के लिए ६ अप्रैल को इतजमा होगा

मुस्लिम महिलाओं को कुरआन और रसूल के बताये मार्ग के प्रति जागरूक करने के लिए ६ अप्रैल को इतजमा होगा

मुस्लिम महिलाओं को कुरआन और रसूल के बताये मार्ग के प्रति जागरूक करने के लिए ६ अप्रैल को इतजमा होगा

६ अप्रैल को मुस्लिम महिलाओं का एक महा सम्मलेन[इतजमा] होगा जिसका शीर्षक मेरी बेटी मेरी इज्जत रखा गया है| स्थानीय रेस्टुरेंट [टिमबक टू] में आयोजित एक प्रेस कांफेरेंस में यह जानकारी दी गई|
इस अवसर पर बताया गया कि पवित्र ग्रन्थ कुरआन करीम और नबी हज़रत मोहम्मद[स. ]ने मानव को इस संसार में एक बहतर + सर्व गुनी +पवित्र जीवन गुजरने का रास्ता दिखाया है,लेकिन दुर्भाग्य वश आज इस रास्ते को भुला दिया गया है|इसी कारण समाज में बुराईयाँ आ गई हैं और इस्लाम की परम्परागत जीवन शैली को क्षति पहुंचा रही है| दार अरकम एजुकेशनल सोसाइटी मेरठ की जानिब से होगा|
आज देश में चहुँ और महिलाओं का उत्पीडन हो रहा है|जिससे हाहाकार मचा हुआ है|ऐसे में कौम की माताओं और बेटियों को आवाज दी है कि वोह कुरआन और रसूल के बताये मार्ग पर चल कर पाकीजा और बहतर जिन्दगी गुजरने की जद्दो जहद में शामिल हों|इसके लिए महिलाओं को इस्लामिक संस्कार और तरबियत दी जानी चाहिए|इससे वोह स्वयम समाज में फ़ैल रही अनैतिकता का मुकाबिल कर सकेगी|
इसके प्रति मुस्लिम महिलाओं को जागरूक करने के लिए ६ अप्रैल ग्यारह बजे फैमस बैंकट हाल में महिला सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा है|जिसमे अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय की प्रवक्ता डा.बज्गा किरमानी+महजबीं+आलिमा जीनत साहिबा आदि शिरकत करेंगी|
अध्यक्षा नायाब जहरा जैदी+रुकय्या शाफिकुर्रहमान +शहनाज अहमद++नसीम अनवर+कमरुन्निसाजैदी +गुलनाज+यास्मीन नूरी+फरहाना अलीम ने प्रेस कांफ्रेंस अटैंड की दार अरकम एजुकेशनल सोसाइटी मेरठ के अध्यक्ष शाफिकुररहमान फातमी ने बताया के मुस्लिम समाज को और विशेष कर महिलाओं को पवित्र कुरआन और रसूल के बताये मार्ग के प्रति जागरूक किया जाना जरुरी है |एक महिला अच्छी संस्कारी बेटी+माँ+सास+बीवी बन कर समाज को सुधार सकती है|

एल के अडवाणी के ब्लाग से :अगले ईस्टर पर भाजपा का पुनः जन्म Reincarnation of B J P On Easter

एन डी ऐ के पी एम् इन वेटिंग और वरिष्ठ पत्रकार एल के आडवाणी ने ईसाईयों के प्रभु यीशु के पुर्नजन्म से जुड़े पवित्र त्यौहार ईस्टर संडे से अपनी पार्टी भाजपा को जोड़ते हुए आगामी चुनावों में अपनी पार्टी के पंर जन्म के संकेत दिए हैं|उन्होंने अपने ब्लॉग में भाजपा के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया है कि प्रभु यीशु को गुड फ्राइडे को सलीब पर चडा कर मानवता का अपमान किया गयाथा उसके ठीक दो दिन बाद के सन्डे [ईस्टर]को प्रभु का पुनः जन्म हुआ और पीड़ित जनता की खुशियाँ लौटी| जैसे पवित्र ईस्टर का त्यौहार एक निश्चित तिथि पर नहीं मनाया जाता ठीक उसी प्रकार देश में एलेक्शन भी अलग अलग तिथियों में कराये जाते हैं| इमरजेंसी के काले युग को समाप्त करने के लिए ६ अप्रैल १९८० को भाजपा का पुनर जन्म हुआ और अब आगामी वर्ष में भी Easter के आस पास ही चुनाव होने के संभावना जताई जा रही है|[Reincarnation of B J P ]
प्रस्तुत है एल के अडवाणी के ब्लॉग से :
गत् रविवार 31 मार्च, 2013 ईस्टर सण्डे (रविवार) था- एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ईसाई त्योहार। जार्जियन कैलेण्डर के मुताबिक जबकि अन्य सभी ईसाई त्योहार प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिन पर पड़ते हैं परन्तु ईस्टर एक ऐसा त्योहार है जो प्रत्येक वर्ष विभिन्न तिथियों पर पड़ता है।
उदाहरण के लिए अगले वर्ष ईस्टर 20 अप्रैल, 2014 को मनाया जाएगा।
सन् 1980 में गठित भारतीय जनता पार्टी में हम लोगों के लिए ईस्टर सण्डे का विशेष महत्व है। 1980 में ईस्टर 6 अप्रैल के रविवार को पड़ा था जिस दिन नई दिल्ली में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी नींव रखी थी।
जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने समाजवादी पार्टी नेता श्री राजनारायण की याचिका पर निर्णय देते हुए श्रीमती गांधी के लोकसभाई निर्वाचन को रद्द कर दिया था। प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी चुनावी कदाचार की दोषी पाई गई थीं और उन्हें अगले 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने के अयोग्य कर दिया गया था।
इस गंभीर घटनाक्रम के बाद कांग्रेस सरकार ने आंतरिक गड़बड़ियों की आड़ में देश पर आपातकाल थोप दिया था। संविधान प्रदत्त सभी मूलभूत अधिकारों को निलम्बित कर दिया गया, विपक्षी दलों के एक लाख से ज्यादा कार्यकर्ता जेलों में डाल दिए गए और मीडिया का ऐसा दमन किया गया जो ब्रिटिश शासन में भी नहीं हुआ था। आपातकाल लगभग 20 महीने तक रहा।
मार्च, 1977 में जब अगले लोकसभाई चुनाव हुए तो भारतीय मतदाताओं ने स्वतंत्रता के पश्चात् पहली बार कांग्रेस पार्टी को नई दिल्ली की सत्ता से उखाड़ फेंका। उस समय के कांग्रेस (ओ) के अध्यक्ष श्री मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।
यद्यपि सन् 1952 के बाद से हुए सभी संसदीय चुनावों में एक प्रचारक या फिर एक प्रत्याशी के रूप में मैंने भाग लिया है परन्तु निस्संकोच मैं कह सकता हूं कि 1977 के चुनाव देश के राजनीतिक इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहे हैं। किसी अन्य अवसर पर चुनावों के नतीजों पर भारतीय लोकतंत्र इतना दांव पर नहीं लगा था जितना इन चुनावों में था। यदि कांग्रेस पार्टी यह चुनाव जीत जाती तो भारत के बहुदलीय लोकतंत्र को समाप्त करने के घृण्श्निात षड़यंत्र-आपातकाल- को जनता की वैधता मिल जाती! इसी प्रकार, किसी और अन्य चुनाव में भी भारतीय मतदाताओं के लोकतांत्रिक विवेक की यह बानगी नहीं मिलती। मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी को बुरी तरह से दण्डित किया। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अनेक प्रदेशों में कांग्रेस को एक सीट भी नहीं मिली।
मोरारजी भाई सरकार ज्यादा नहीं चल पाई। अंदरूनी उठापठक के चलते 1979 में यह गिर गई। अगले लोकसभाई चुनाव 1980 में सम्पन्न हुए। जनता पार्टी के हम लोगों को साफ लगता था कि हम बुरी तरह हारेंगे। परन्तु इस उठापठक ने वास्तव में जनता पार्टी की शोचनीय हालत कर दी। सन् 1977 में 298 सीटें जीतने वाली जनता पार्टी 1980 में मात्र 31 सीटों पर सिमट कर रह गई। इन 31 सांसदों में से जनसंघ की संख्या सन् 1977 में 93 की तुलना में 16 रह गई।
1980 के चुनावों के शीघ्र पश्चात् जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई जिसमें यह तय हुआ कि पार्टी की संगठनात्मक वृध्दि पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। पार्टी कार्यकारिणी ने जनता पार्टी का सदस्यता अभियान चलाने का भी फैसला किया ताकि निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक पार्टी के चुनाव कराए जा सकें। मैं मानता हूं कि इसी निर्णय ने पार्टी के कुछ वर्गों को आशंकित कर दिया जिसे बाद में दोहरी सदस्यता विरोधी अभियान के रूप में जाना गया। यह अभियान जनसंघ के पूर्व सदस्यों के विरूध्द था जिनके बारे में आरोप लगाया गया कि वे केवल जनता पार्टी के सदस्य नहीं हैं अपितु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी सदस्य हैं। यह सभी को विदित था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक राजनीतिक दल नहीं है। यह ऐसा था कि किसी कांग्रेसी जो आर्यसमाजी भी है, पर दोहरी सदस्यता का आरोप लगाया जाए! शीघ्र ही यह कानाफूसी अभियान शुरू हो गया कि यदि पूर्व जनसंघियों को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से सम्बन्ध रखने दिया गया तो मुस्लिम मतदाता पार्टी से विलग हो जाएंगे।
दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर हुए तीखे विवाद पर एक सही परामर्श प्रख्यात गांधीवादी और स्वतंत्रता-सेनानी अच्युत पटवर्धन ने दिया। उन्होंने 9 जून, 1979 को ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में ‘जनता, आर.एस.एस. ऐंड द नेशन‘ शीर्षक वाले लेख में लिखा-‘आपाताकल के विरूध्द जन-संघर्ष में महान् योगदान की क्षमता के कारण भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी के प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया गया था। आपातकाल की समाप्ति के बाद से अब तक जनसंघ और या संघ ने ऐसा क्या क्या किया, जिसने श्री मधु लिमये और श्री राजनारायण तथा उनके समर्थकों को इन्हें बदनाम करने का एक उग्र अभियान छेड़ने के लिए प्रेरित किया?
श्री वाजपेयी, श्री नानाजी देशमुख और मैंने इस दोहरी सदस्याता के अभियान का प्रखर विरोध किया। पार्टी की बैठकों में, मैंने कहा कि हमारे साथ पार्टी में ऐसा व्यवहार किया जा रहा है, जैसे मानों हम अस्पृश्य हों। मेंने आगे कहा:
‘जनता पार्टी के पांच घटक थे- कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी, सी.एफ.डी. और जनसंघ। राजनीतिक दृष्टि से कहें तो इनमें से पहले चार द्विज थे, जबकि जनसंघ की स्थिति हरिजन जैसी थी, जिसे परिवार में शामिल किया गया हो।
वर्ष 1977 में इसे पार्टी में स्वीकार करते समय काफी हर्षोल्लास था। पर समय बीतने के साथ परिवार में एक ‘हरिजन‘ की उपस्थिति ने समस्याएं शुरू कर दीं। ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं था बल्कि देश भर में पूर्ववर्ती जनसंघ के लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों की गूंज इसमें शामिल थी। फरवरी-मार्च 1980 में जनसंघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी सुंदर सिंह भंडारी और मैंने देश भर का दौरा कर जमीनी स्तर पर जनता पार्टी के बारे में लोगों के विचार जानने के प्रयास किए। जहां भी हम गए, हमने पाया कि पूर्ववर्ती जनसंघ के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर घोर आपत्ति थी कि पार्टी के भीतर उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
जनता पार्टी के नेतृत्व ने दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अंतिम निर्णय करने के उद्देश्य से पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की 4 अप्रैल को बैठक बुलाई। इस बैठक से निकलने वाले नतीजों को भांप पर श्री वाजपेयी और नानाजी सहित हमने जनसंघ के पूर्व सदस्यों का एक सम्मेलन 5 और 6 अप्रैल, 1980 को बुलाया।
जैसाकि अपेक्षित था कि 4 अप्रैल को जनता पार्टी की कार्यकारिणी ने पूर्व जनसंघ के सभी सदस्यों को निष्कासित करने का फैसला लिया। अपनी आत्मकथा में मैंने उल्लेख किया है:
”जनसंघ के हम सभी सदस्यों को जनता पार्टी से निष्कासन का फैसला बड़ी राहत लेकर आया। 5 और 6 अप्रैल, 1980 के दो दिवसीय सम्मेलन ने स्फूर्तिदायक भावना और दृढ़ विश्वास जोड़ा।
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में 3,500 से अधिक प्रतिनिधि एकत्र हुए और 6 अप्रैल को एक नए राजनीतिक दल ‘भारतीय जनता पार्टी‘ (भाजपा) के गठन की घोषणा की गई। अटल बिहारी वाजपेयी को इसका पहला अध्यक्ष चुना गया। सिकंदर बख्त और सूरजभान के साथ मुझे महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई।”
इस ब्लॉग की शुरूआत में मैंने ‘ईस्टर सण्डे‘ का संदर्भ दिया जिसे ईसाई दो दिन बाद पड़ने वाले गुडफ्राइडे को त्यौहार के रूप में मनाते हैं, माना जाता है कि इसी दिन यीशु पुनर्जीवित हुए थे। ईस्टर सण्डे को ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने का दिन जाना जाता है।
हमारी पार्टी के सम्बन्ध में भी 1980 में गुड फ्राइडे के दिन जनता पार्टी के प्रस्ताव से हमें सूली पर चढ़ाया गया और ईस्टर सण्डे के दिन हम पुनर्जीवित हुए।

डा.. मन मोहन सिंहने पुराने रिश्तों का हवाला देते सीआईआई से सहयोग की कामना की

कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) की वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री डा. मन मोहन सिंह ने आज कंफेडरेशन से अपने पुराने मधुर रिश्तों का हवाला देते हुए व्यावसायिक क्षेत्र में साझेदारी की कामना की | उन्होंने कहा की वर्तमान में उद्योग जगत में निराशा है |विकास दर गिरकर पांच प्रतिशत तक पहुंच गई है| सरकार विकास दर आठ प्रतिशत तक हासिल करने के लिए प्रयास कर रही है। लेकिन विकास की इस नई इबारत को लिखने के लिए सरकार और व्यावसायिक क्षेत्र की साझेदारी की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, विकास दर में आई गिरावट अस्थायी है।
इस वार्षिक बैठक में उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि कारोबारी माहौल, जो 2007 में असामान्य रूप से आशावादी था, आज असामान्य रूप से निराशावादी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पांच फीसदी की धीमी विकास दर निराशाजनक है, लेकिन फिर से यह आठ फीसदी हो सकता है।प्रधानमंत्री ने कहा, हमें स्वीकार करना होगा कि निर्यात कमजोर रहेगा और चालू खाता घाटा उम्मीद से अधिक रहेगा। हम राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए हरसंभव कदम उठाने को प्रतिबद्ध हैं।
उन्होंने कहा, वर्तमान अस्थायी आर्थिक गिरावट के लिए आंशिक तौर पर वैश्विक तत्व जिम्मेदार हैं। हमें सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।
उन्होंने साथ में यह भी कहा, नौकरशाही में भ्रष्टाचार और काहिली समस्याएं हैं। गठबंधन चलाना आसान नहीं।
भूमि अधिग्रहण को लेकर पिछले दिनों उठे विवादों पर उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण विधेयक + जल्द ही संसद में पेश होगा। कोयला खदान और पेट्रोलियम के छेत्र में सुधार किये जायेंगे |
डा. सिंह ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की वार्षिक आमसभा में कहा कि सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में और राहत देगी और मुद्रास्फीति कम करने के लिए कदम उठाएगी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास दर निराशाजनक है। यह अस्थाई गिरावट है, जिसके लिए आंशिक तौर पर वैश्विक तत्व जिम्मेदार हैं। हम आठ फीसदी विकास दर पर लौट सकते हैं। उन्होंने साथ ही कहा कि सरकार विकास को बढ़ावा देने के लिए निर्णायक और त्वरित कार्रवाई करेगी।
पी एम् ने कहा कि कारोबारी माहौल, जो वर्ष 2007 में असामान्य रूप से आशावादी था, आज अनावश्यक रूप से निराशावादी है। मैं भारतीय उद्योग जगत से अपील करूंगा कि हमारे संकल्प में विश्वास रखे और निराशा में न फंसे। मनमोहन सिंह ने कहा कि राजकोषीय घाटा बढ़ने से चालू खाते का घाटा बढ़ा है। अनुमान है कि वर्ष 2012-13 में यह जीडीपी के करीब पांच फीसदी तक रहेगा।
उन्होंने कहा कि रक्षा विभाग की मंजूरी की प्रतीक्षा में पेट्रोलियम क्षेत्र में 20 अरब डॉलर मूल्य का निवेश और 40 ब्लॉकों में तेल-गैस खोज का काम वर्षों से रुका हुआ था। इस समस्या को जल्द सुलझा लिया जाएगा

एल के आडवाणी के ब्लॉग से टेलपीस (पश्च्यलेख):प्रचार अभियान में फंसते वोटर्स

 एल के आडवाणी के ब्लॉग से टेलपीस (पश्च्यलेख):प्रचार अभियान में फंसते वोटर्स

एल के आडवाणी के ब्लॉग से टेलपीस (पश्च्यलेख):प्रचार अभियान में फंसते वोटर्स

एन डी ऐ के पी एम् इन वेटिंग एल के आडवाणी ने अपने ब्लॉग में एक बेहद पुराने चुटकले के माध्यम से वर्तमान राजनीतिक पार्टियों के चरित्र पर कटाक्ष किया है|प्रस्तुत है ब्लाग से उद्धत टेलपीस (पश्च्यलेख
एक व्यक्ति स्वर्ग पहुंचा और पर्ली गेट्स पर सेंट पीटर से मिला। सेंट पीटर ने कहा आज अलग बात है, तुम्हारे सम्मुख स्वर्ग या नरक का विकल्प खुला है; हम तुम्हें दोनों में एक-एक दिन देंगे और तुम अपनी पसंद बताओगे। अत: व्यक्ति ने कहा ठीक है और उसे नरक भेज दिया।
वह नरक पहुंचा और जहां तक उसकी नजरें जा सकती थीं वहां तक हरियाली थी। उसने बीयर का एक बड़ा पीपा, एक गोल्फ कोर्स और अपने पुराने जिगरी दोस्त देखे। उसने गोल्फ का एक राऊण्ड खेला, पीना-पिलाना हुआ और अपने जिगरी दोस्तों के साथ मौज मस्ती की। उसे लगा यह ठीक है।
बाद में वह स्वर्ग गया। उसने पाया कि वहां शांति है, आप बादलों से दूसरे बादलों पर कूद सकते हो और बीन बजा सकते हो।
दिन बीतते ही सेंट पीटर उसके पास पहुंचे और उससे उसकी पसंद के बारे में पूछा: बगैर रूके उसने कहा: ”मैं नरक जाना पसंद करूंगा।”
वह तुरंत नरक गया लेकिन वहां उसे गंदगी और लावा के सिवाय कुछ नहीं मिला। बीयर का पीपा नदारद था, और उसके जिगरी दोस्त भी कहीं नहीं थे।
वह शैतान पर चिल्लाया कि क्या हुआ? कल यह स्थान अद्भुत था। शैतान ने जवाब दिया, ”कल हम प्रचार अभियान चला रहे थे, आज आप ने वोट डाल दिया है।”

मनोज [भारत]कुमार ने शाहरुख़ खान पर केस किया

पुरानी कहावत है कि मज़ाक भी अपने बराबर वालों से करना चाहिए लेकिन शाहरुख़ खान यह भूल गए और अपनी हित फिल्म ॐ शांति ॐ में अपने से बड़े मनोज [भारत]कुमार का भी मजाक उड़ा बैठे |बेशक यह बात छह[२००७] साल पुराणी है |और कई बार आई गई हो चुकी है|लेकिन फिल्म लाईन में आज कल पुरानी हिट को रीमेक का चलन है सो मनोज कुमार ने भी शाहरुख़ खान एंड कंपनी के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज़ करवा दिया है| पाने जमाने के मशहूर [ एवार्डडेड ] अभिनेता +निर्माता+निर्देशक मनोज [भारत]कुमार ने फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के एक दृश्य से कथित तौर पर उनकी छवि खराब होने के मामले में शाहरुख खान और फराह खान पर मुंबई में आपराधिक मामला दर्ज कराया है।इसे पूर्व वानखेड़े स्टेडियम में एक सिक्योरिटी गार्ड से पंगा ले चुके शाहरुख़ खान चर्चा में है

मनोज [भारत]कुमार ने शाहरुख़ खान पर केस किया

मनोज [भारत]कुमार ने शाहरुख़ खान पर केस किया

शाहरुख़ खान पर आपराधिक विश्वासघात+ धोखाधड़ी+ मानहानि और साजिश रचने जैसे अपराधों केआरोप लगाये गए हैं|
गौरतलब है कि 2007 में ॐ शांति ॐ रिलीज हुई ‘जिसके एक दृश्य में शाहरुख ने कथित तौर पर मनोज कुमार का मजाक उड़ाया है। कथित तौर पर इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि मनोज कुमार को एक शो के दौरान एक समारोह में घुसने नहीं दिया जाता।उनसे अपना परिचय पत्र दिखाने को कहा जाता है तो परिचय पत्र में भी उनके मुह ढकने के स्टाइल में ही फोटो लगी होती है|हाथ से मुह ढकने का मनोज कुमार का यह स्टाईल बेहद आलोचनाओं का शिकार रहा है|
इसीलिए 2008 में भी इस दृश्य पर विरोध दर्ज कराते हुए मानहानि का मामला दर्ज किया था लेकिन जब शाहरुख ने निजी तौर पर उनसे माफी मांगकर इस दृश्य को हटाने का आश्वासन दिया तो मामला वापस ले लिया गया।इस मामले को सुलझाने में यश चोपड़ा [अब स्वर्गीय ]ने भी अहम् भूमिका निभाई थी|
अदालत ने भी 2008 में शाहरुख को निर्देश दिया था कि टीवी चैनलों पर फिल्म के प्रसारण से पहले विवादास्पद दृश्य को फिल्म में से हटा लिया जाए।
मनोज कुमार ने अपने वकील अशोक के माध्यम से अंधेरी मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में कहा है कि इस फिल्म को जापान में रिलीज किया गया और उसमे वोह आपत्ति जनक सीन रखे गए हैं| यह न्यायलय का भी अपमान है|

डाक्टर चन्द्र मोहन कोहली ने C G H S के अतिरिक्त निदेशक का कार्यभार संभाला

डाक्टर चन्द्र मोहन कोहली ने C G H S के अतिरिक्त निदेशक का कार्यभार संभाला

डाक्टर चन्द्र मोहन कोहली ने C G H S के अतिरिक्त निदेशक का कार्यभार संभाला

डाक्टर चन्द्र मोहन कोहली को केन्द्रीय कर्मचारी स्वास्थय यौजना[CGHS] का अतिरिक्त निदेशक[ADDITIONALDIRECTOR] बनाया गया है|डाक्टर कोहली ने नए वितीय वर्ष में नया पद भर ग्रहण कर लिया है|
इससे पूर्व डा. कोहली कंकर खेडा स्थित वेलनेस सेंटर के इंचार्ज थे | आर्थोपेडिक सर्जन डा. कोहली ने १९ ७९ में एम् बी बी एस और ८९ में गोल्ड मैडल के साथ डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण कीथी|विश्व स्वास्थ्य संगठन [WHO]के फेलो हैं|गौरतलब है कि केन्द्रीय कर्मचारियों केलगभग१० हज़ार परिवारों के स्वास्थ्य सेवा के लिए मेरठ के कंकर खेडा के अलावा+सूरज कुंड+ विजय नगर+मोहन पूरी+आबू लेन आदि में वेल नेस सेंटर हैं|

सांसद राजेंद्र अग्रवाल को भाजपा की कार्यकारिणी की सदस्यता मिली:Rajendra Agarawal national executive member ofB J P

सांसद राजेंद्र अग्रवाल को भाजपा की कार्यकारिणी की सदस्यता मिली:Rajendra Agarawal national executive member of B J P

सांसद राजेंद्र अग्रवाल को भाजपा की कार्यकारिणी की सदस्यता मिली:Rajendra Agarawal national executive member of B J P

मेरठ के सांसद राजेंद्र अग्रवाल को भाजपा की कार्यकारिणी में शामिल किया गया है | पार्टी की वेब साईट पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों की लिस्ट में क्रम संख्या ७३ पर राजेन्द्र अग्रवाल को स्थान दिया गया है| मेरठ में संभवत पहली बार किसी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्यता प्रदान की गई है|
श्री अग्रवाल पहले से ही उत्तर प्रदेश सचेतक हैं और उत्तराखंड में भी सक्रिय रहते हैं||इस जिम्मेदारी के साथ श्री की प्राथमिकताएं पूछी गई तो उन्होंने बताया के पार्टी के दिशा निर्देशों को अक्षरः पालन करने के लिए समर्पित रहेंगे|इस चयन का श्रेय उन्होंने अपने निस्वाथ भाव से किये जा रहे जन हित के कार्यों को दिया और इन कार्यों को मान्यता देने के लिए पार्टी अध्यक्ष राज नाथ सिंह को धन्यवाद दिया|श्री अग्रवाल ने संसद के आगामी सत्र में भी छेत्र की समस्यायों कोउठाने के अपने संकल्प को दोहराया है|

बेनी प्रसाद वर्मा के शाब्दिक बाणों को भाजपा ने अमर्यादित और अप्रासंगिक बता कर टिपण्णी के भी लायक नहीं समझा

कांग्रेस के केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के तीखे शाब्दिक बाणों से उत्तर प्रदेश में सत्ता रुड समाज वादी पार्टी बेशक विचलित नज़र आ रही है लेकिन प्रदेश में भाजपा न्रेतत्व बेनी के ब्यानों को अमर्यादित और अप्रासंगिक बता कर टिपण्णी के भी लायक नहीं समझ रही है|बेनी प्रसाद वर्मा ने अपने पूर्व पार्टी समाजवादी की आलोचना करते हुए भाजपा को भी लपेट लिया |मीडिया के समक्ष बेनी ने कहा कि १६ वी लोक सभा में उत्तर प्रदेश की ८० सीटों में से कांग्रेस को ४० और समाजवादी की अर्थी उठाने के लिए सपा के ४ सांसद ही आयेंगे |अपनी वर्तमान सहयोगी बसपा को उन्होंने ३६ सीट तो केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी के लिए मात्र १० सीटों के लिए भविष्यवाणी की |इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए जब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर लक्ष्मी कान्त वाजपई से संपर्क किया गया तो उन्होंने बेनी प्रसाद वर्मा की टिपण्णी को अमर्यादित और अप्रसांगिक बताया और कहा कि यह टिपण्णी के लायक भी नहीं है|उन्होंने कहा कि यह जनता तय करेगी कि किसको कितनी सीटें मिलेगी|

 बेनी प्रसाद वर्मा के शाब्दिक बाणों को भाजपा ने अमर्यादित और अप्रासंगिक बता कर टिपण्णी के भी लायक नहीं समझ

बेनी प्रसाद वर्मा के शाब्दिक बाणों को भाजपा ने अमर्यादित और अप्रासंगिक बता कर टिपण्णी के भी लायक नहीं समझ


लोक सभा के चुनावों के लिए भाजपा की तैय्यारियों के विषय में पूछे जाने पर पहले उन्होंने कांग्रेस और सपा की नकारत्मक उपलब्धियों का ब्योरा दिया|उन्होंने बताया कि[१] महंगाई जनक+भ्रष्टाचार पोषक+कांग्रेस[२] बसपा की जातिवादी नीति और सपा के कुशासन से जनता तंग आ चुकी है| इसीलिए जनता अब बदलाव चाहती है|इस संधर्भ में अपनी सकारत्मक उपलब्धियों का वर्णन करते हुए डा. वाजपई ने बताया कि भाजपा के सुशासन+राष्ट्रवाद+अटल बिहारी वाजपई सरकार की स्वछ छवि के आधार पर जनता के बीच जायेंगे और देश में सात भाजपा शासित प्रदेशों में आये क्रांतिकारी विकास से जनता को जागरूक किया जाएगा|
उन्होंने बताया कि[१] लाडली लक्ष्मी यौजना के अंतर्गत बिना धर्म और जाति के भेद भाव किये कन्यायों को १८०००/- दिए जा रहे हैं और १८ साल होने पर १०००००/= दिए जा रहे हैं|[२]गावं से स्कूल जाने वाली छात्रा को एक साईकिल दी जा रही है[३]किसानो को जीरो प्रतिशत ब्याज पर लोन दिया जा रहा है|
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और मेरठ शहर[वरिष्ठ] विधायक डाक्टर वाजपई ने गर्व से बताया कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा विकास की द्रष्टि से भाजपा शासित राज्य गुजरात को विश्व में दूसरा और मध्य प्रदेश को ४२वा राज्य घोषित किया है |इनके अलावा किसी भी और राज्य को शामिल नहीं किया गया है|
डाक्टर वाजपई ने दावा किया है कि उत्तर प्रदेश में भी लाडली लक्ष्मी +१८ साल पूरे होने पर एक लाख की राशि+ छात्राओं को साईकिल और किसानों को बिना ब्याज के ऋण उपलब्ध कराया जाएगा|

एल के अडवाणी के ब्लाग से :न्यायिक नियुक्तियों सम्बन्धी कॉलिजियम पध्दति इमरजेंसी से भी ज्यादा घातक

एन डी ऐ के पी एम् इन वेटिंग और वरिष्ठ पत्रकार लाल कृषण अडवाणी ने अपने ब्लॉग में वर्तमान न्यायिक नियुक्तियों सम्बन्धी कॉलिजियम पध्दति पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे लोक तंत्र के लिए इमरजेंसी कल से भी ज्यादा घातक बताया है उन्होंने इस कॉलिजियम पध्दति की पुनरीक्षा की जरूरत पर बल दिया है|इस ब्लाग में श्री अडवाणी ने टेलपीस नही दिया है
प्रस्तुत है एल के अडवाणी के ब्लाग से एक वरिष्ठ पत्रकार की चिंता
भारत को स्वतंत्र हुए 65 से ज्यादा वर्ष हो गए हैं। यदि कोई मुझसे पूछे कि साढ़े छ: दशकों की इस अवधि में देश की सर्वाधिक बड़ी उपलब्धि क्या रही है, तो निस्संकोच मेरा जवाब होगा : लोकतंत्र।

एल के अडवाणी के ब्लाग से :न्यायिक नियुक्तियों सम्बन्धी कॉलिजियम पध्दति इमरजेंसी से भी ज्यादा घातक

एल के अडवाणी के ब्लाग से :न्यायिक नियुक्तियों सम्बन्धी कॉलिजियम पध्दति इमरजेंसी से भी ज्यादा घातक

हम गरीबी, निरक्षरता और कुपोषण पर विजय नहीं पा सके हैं। लेकिन पश्चिमी विद्वानों के प्रचंड निराशावाद के विपरीत 1947 के बाद से औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने वाले देशों में विशेष रूप से भारत जीवंत और बहुदलीय लोकतंत्र बना हुआ है।
यह भी सत्य है कि 1975-77 के आपातकाल की अवधि के दो वर्ष का कालखण्ड एक काले धब्बे की तरह है, जब कानून का शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की अन्य जरूरी विशेषताओं पर ग्रहण लग गया था।
मेरा मानना है कि 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय जिसने न केवल प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया था अपितु उनके 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगाई थी, की आड़ में सत्ता में बैठे लोगों ने हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रदत्त लोकतंत्र को ही समाप्त करने का गंभीर प्रयास किया।
पं. नेहरू द्वारा शुरू किये गये नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचार-पत्र नेशनल हेराल्ड ने तंजानिया जैसे अफ्रीकी देशों में लागू एकदलीय प्रणाली की प्रशंसा करते हुए एक सम्पादकीय लिखा:
जरूरी नहीं कि वेस्टमिनिस्टर मॉडल सबसे उत्तम मॉडल हो और कई अफ्रीकी देशों ने इस बात का प्रदर्शन कर दिया है कि लोकतंत्र का बाहरी स्वरूप कुछ भी हो, जनता की आवाज का महत्व बना रहेगा। एक मजबूत केन्द्र की आवश्यकता पर जोर देकर प्रधानमंत्री ने भारतीय लोकतंत्र की शक्ति की ओर संकेत किया है। एक कमजोर केंद्र होने से देश की एकता, अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा को खतरा पहुंच सकता है। उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है : यदि देश की स्वतंत्रता कायम नहीं रह सकती तो लोकतंत्र कैसे कायम रह सकता है?
दो सदियों के ब्रिटिश राज में भी अभिव्यक्ति के अधिकार को इतनी निर्ममता से नहीं कुचला गया जितना कि 1975-77 के आपातकाल के दौरान। 1,10,806 लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया, जिनमें 253 पत्रकार थे।
इस सबके बावजूद यदि लोकतंत्र जीवित है तो इसका श्रेय मुख्य रूप से मैं दो कारणों को दूंगा: पहला, न्यायपालिका; और दूसरा मतदाताओं को जिन्होंने 1977 में कांग्रेस पार्टी को इतनी कठोरता से दण्डित किया कि कोई भी सरकार आपातकाल के प्रावधान का दुरूपयोग करने की हिम्मत नहीं कर पाएगी जैसा कि 1975 में किया गया।
सभी प्रमुख राजनीतिक नेताओं, सांसदों इत्यादि को आपातकाल में मीसा-आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने वाले कानून-के तहत बंदी बना लिया गया था। इनमें जयप्रकाश नारायण के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, चन्द्रशेखरजी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता भी थे। कुल मिलाकर मीसाबंदियों की संख्या 34,988 थी। कानून के तहत मीसाबंदियों को कोई राहत नहीं मिल सकती थी।
सभी मीसाबंदियों ने अपने-अपने राज्यों के उच्च न्यायालयों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की हुई थी। सभी स्थानों पर सरकार ने एक सी आपत्ति उठाई: आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलम्बित हैं और इसलिए किसी बंदी को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। लगभग सभी उच्च न्यायालयों ने सरकारी आपत्ति को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिए। सरकार ने इसके विरोध में न केवल सर्वोच्च न्यायालय में अपील की अपितु उसने इन याचिकाओं की अनुमति देने वाले न्यायाधीशों को दण्डित भी किया। अपने बंदीकाल के दौरान मैं जो डायरी लिखता था उसमें मैंने 19 न्यायाधीशों के नाम दर्ज किए हैं जिनको एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में इसलिए स्थानांतरित किया गया कि उन्होंने सरकार के खिलाफ निर्णय दिया था!
16 दिसम्बर, 1975 की मेरी डायरी के अनुसार:
सर्वोच्च न्यायालय मीसाबन्दियों के पक्ष में दिये गये उच्च न्यायालय के फैसलों के विरूध्द भारत सरकार की अपील सुनवाई कर रहा है। इसमें हमारा केस (चार सांसद जो एक संसदीय समिति की बैठक हेतु बंगलौर गए थे लेकिन उन्हें वहां बंदी बना लिया गया) भी है। न्यायमूर्ति खन्ना ने निरेन डे से पूछा कि : संविधान की धारा 21 में केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं बल्कि जिंदा रहने के अधिकार का भी उल्लेख है। क्या महान्यायवादी का यह भी अभिमत है कि चूंकि इस धारा को निलंबित कर दिया गया है और यह न्यायसंगत नहीं है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति मार डाला जाता है तो भी इसका कोई संवैधानिक इलाज नहीं है? निरेन डे ने उत्तर दिया कि : ”मेरा विवेक झकझोरता है, पर कानूनी स्थिति यही है।”
यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश न्यायाधीशों ने बाद में स्वीकारा कि उक्त कुख्यात केस में फैसला गलत था। इनमें से कई ने सार्वजनिक रूप् से अपने विचारों को प्रकट किया।
सन् 2011 में, सर्वोच्च न्यायालय ने औपचारिक रुप से घोषित किया कि सन् 1976 में इस अदालत की संवैधानिक पीठ द्वारा अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस में दिया गया निर्णय ”त्रुटिपूर्ण‘ था, चूंकि बहुमत निर्णय ”इस देश में बहुसंख्यक लोगों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करता है,” और यह कि न्यायमूर्ति खन्ना का असहमति वाला निर्णय देश का कानून बन गया है।
इन दिनों देश में सर्वाधिक चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है। एक समय था जब भ्रष्टाचार की बात कार्यपालिका-राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के संदर्भ में की जाती थी। कोई भी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात नहीं करता था, विशेषकर उच्च न्यायपालिका के बारे में तो नही ही।
परन्तु हाल ही के वर्षों में इसमें बदलाव आया है। सर्वोच्च न्यायालय की एक पूर्व न्यायाधीश रूमा पाल ने नवम्बर, 2011 में तारकुण्डे स्मृति व्याख्यानमाला में बोलते हुए ”न्यायाधीशों के सात घातक पापों” को गिनाया। इनमें भ्रष्टाचार भी एक था।
अपने भाषण में उन्होंने कहा कि यह मानना कि आजकल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, भी ”न्यायपालिका की स्वतंत्रता की विश्वसनीयता के लिए उतना ही हानिकारक है जितना कि भ्रष्टाचार।”
मैं अक्सर इस पर आश्चर्य व्यक्त करता हूं कि यदि जून 1975 जैसी स्थिति आज देखने को मिले तो न्यायपालिका की प्रतिक्रिया कैसी होगी। क्या उच्च न्यायालयों के कम से कम 19 न्यायाधीश मीसाबंदियों के पक्ष में निर्णय कर कार्यपालिका की नाराजगी मोल लेने का साहस जुटा पाएंगे? सचमुच में मुझे संदेह है।
कालान्तर में, चयनित न्यायाधीशों के स्तर के सम्बन्ध में काफी बदलाव आया है जब रूमा पाल ने न्यायाधीशों के सात पापों के बारे में बोला तो, स्वयं एक सम्मानित न्यायविद् होने के नाते उन्होंने अपने भाषण में जानबूझकर यह चेतावनी जोड़ी कि वह ”सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षित” होकर बोल रही हैं।
वर्तमान में, न्यायिक नियुक्तियों और न्यायाधीशों के तबादले – भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की एक समिति जिसे ‘कॉलिजियम‘ कहा जाता है, द्वारा किए जाते हैं। इस कॉलिजियम प्रणाली की जड़ें तीन न्यायिक फैसलों (1993, 1994 और 1998) में निहित हैं। इनमें से पहला और दूसरा निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा ने दिया। फ्रंटलाइन पत्रिका (10 अक्तूबर, 2008) को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा ”सन् 1993 का मेरा निर्णय जिसका हवाला दिया जाता है को बहुत ज्यादा गलत समझा गया, दुरूपयोग किया गया। यह उस संदर्भ में कहा गया कि कुछ समय से निर्णयों की कार्यपध्दति के बारे में जो गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं उन्हें गलत नहीं कहा जा सकता। इसलिए पुनर्विचार जैसा कुछ होना चाहिए।”
सन् 2008 में, विधि आयोग ने अपनी 214वीं रिपोर्ट में विभिन्न देशों की स्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा: ”अन्य सभी संविधानों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में या तो कार्यपालिका एकमात्र प्राधिकरण्ा है या कार्यपालिका मुख्य न्यायाधीशों की सलाह से न्यायधीशों की नियुक्ति करती है। भारतीय संविधान दूसरी प्रणाली का अवलम्बन करता है। हालांकि, दूसरा निर्णय कार्यपालिका को पूर्णतया विलोपित अथवा बाहर करता है।”
‘फ्रंटलाइन‘ में प्रकाशित न्यायमूर्ति वर्मा के साक्षात्कार को उदृत करते हुए विधि आयोग लिखता है: ”भारतीय संविधान अनुच्छेद 124 (2) और 217(1) के तहत नियंत्रण और संतुलन की सुंदर पध्दति का प्रावधान करता है कि सर्वोच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका और न्यायपालिका की संतुलित भूमिका का उल्लेख है। यही समय है कि अधिकारों के संतुलन का वास्तविक स्वरुप पुर्नस्थापित किया जाए।”
हम, विश्व का सर्वाधिक बड़ा लोकतंत्र हैं जिसमें स्वाभाविक रुप से आशा की जाती है कि कम से कम उच्च न्यायिक पदों से जुड़ी नियुक्तियां पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता आधारित पध्दति से हों। तारकुण्डे स्मृति व्याख्यानमाला में न्यायमूर्ति रुमा पाल ने टिप्पणी की कि ”सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया देश में सर्वाधिक रुप में गुप्त रखे जाने वाला विषय है।”
उन्होंने कहा कि ”इस प्रक्रिया की ‘रहस्यात्मकता‘ जिस छोटे से समूह से यह चयन किया जाता है और बरती जाने वाली ‘गुप्तता और गोपनीयता‘ सुनिश्चित करती है कि ‘अवसरों पर प्रक्रिया में गलत नियुक्तियां हो जाती हैं और इससे ज्यादा अपने आप को भाईभतीजावाद में फंसा देती हैं।”
वे कहती हैं कि एक अविवेकपूर्ण टिप्पणी या अनायास अफवाह ही पद के लिए किसी व्यक्ति की दृष्टव्य सुयोग्यता को बाहर कर सकती है। उनके अनुसार मित्रता और एहसान कभी-कभी अनुशंसाओं को सार्थक बना देते हैं।